Friday, September 7, 2012

तुम


जागो मोहन जागो
जागो रे मन जागो
जागो जीवन जागो

जागना है तुम्हें
जगाना है तुम्हें
जगजगाना है तुम्हें

तुम देह नहीं
माटी नहीं तुम  
न कोई दु:ख हो

तुम्हारी स्वांस छू रहा कोई
तुममें कोई स्वर कोई अनहद बज रहा
तुम अद्भूत मात्र एक हो

तुम यात्रा हो
तुम पथिक हो
तुम खोजी हो

तुम चेतना  
तुम दीपक
तुम्ही प्रेम

जाने के बाद भी तुम हो
अब भी तुम
तुम थे हो रहोगे

अपने अंतस का वातायन तो खोलो
कितना मनोरम दृश्य है वहाँ
शांति की अजस्र धार वहाँ
पूरा थिर है पर लय है
आवाज नहीं पर ताल है

सचमुच तुम बूँद हो
पर समुद्र की गहराई है तुममें
मै जितना तुम हूँ
उतना ही तुम मैं हो |


Saturday, August 4, 2012

वापसी


योग-मुद्रा 
जी उठा हूँ फिर से उर्जस्वित होकर
साँस की प्राण-वायु अपनी रग-रग में भरकर
स्वयं का संधान कर स्वयं में अंतर्लीन होकर 

यह प्रयाण जरूरी था मेरे लिये –
न कोई रंग न कोई हब-गब
जीवन सादा पर सक्रिय है यहाँ
दैनिक क्रियाएँ सरल हैं
स्वर जैसे थम गया हो
हृदय-वीणा के तार जैसे यकायक 
तनावमुक्त हो झनझनाकर स्थिर हुए हों  

पर सकल आलाप अब शांत है
नीरवता में इस दिनांत की साँझ-वेला में
कोई थिर स्वर उतर रहा है काया के नि:शब्द प्रेम-कुटीर में 
अंतर्तम विकसित हो रहा है चित्त स्पंदित हो रहा है
धवल उज्ज्वल आलोक-सा छा रहा है घट के अंदर
कोई सिरज रहा है मुझे फिर से      
सचमुच मैं जाग रहा हूँ धीरे-धीरे नवजीवन के विहान में

वहाँ जिनसे मुझे प्रेम मिला था
वह मुझे अपने पास बाँधकर रखना चाहते थे
पर अब अनुभव हो रहा है मुझे - 
जड़ता से बचने के लिए, निजता को बचाने के लिये
उनकी दुनिया से अपनी दुनिया मेँ वापस लौटने का मेरा निर्णय सही था |

Saturday, July 28, 2012

हृदय भी मेरा हाथ है




इस पन आकर मुझे
इलहाम हुआ कि
हृदय भी एक हाथ था मेरा
अरसे से मेरी पीठ से बँधा
फ़िजूल बंधनों से नधा

हृदय हां, अब भी
एक हाथ है मेरा
मुझ आँख के अंधे की
      लाठी
इस अंधेर दुनिया के भटकन में

और देखो, वह
बुला रहा है मुझे
और तुम्हें भी
उसकी आवाज़ गौ़र से सुनो
इस तन-तंबूरे में


कह रहा है कोई
सच्ची बात
हित की बात
ओह, सुनी तुमने
पहले कभी
इतनी भली बात !

उसकी टूटन
और नहीं सहूंगा
अक्षर-अक्षर
हृदय के कहन का
लोक लूंगा !

इस राह चलते
मन की डींगे
खूब सुनता आया हूं, अब
अपने हृदय को भी
हाँक लूंगा

इस यात्रा में
हां,..हृदय को भी
अपने साथ लूंगा।

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