Saturday, August 4, 2012

वापसी


योग-मुद्रा 
जी उठा हूँ फिर से उर्जस्वित होकर
साँस की प्राण-वायु अपनी रग-रग में भरकर
स्वयं का संधान कर स्वयं में अंतर्लीन होकर 

यह प्रयाण जरूरी था मेरे लिये –
न कोई रंग न कोई हब-गब
जीवन सादा पर सक्रिय है यहाँ
दैनिक क्रियाएँ सरल हैं
स्वर जैसे थम गया हो
हृदय-वीणा के तार जैसे यकायक 
तनावमुक्त हो झनझनाकर स्थिर हुए हों  

पर सकल आलाप अब शांत है
नीरवता में इस दिनांत की साँझ-वेला में
कोई थिर स्वर उतर रहा है काया के नि:शब्द प्रेम-कुटीर में 
अंतर्तम विकसित हो रहा है चित्त स्पंदित हो रहा है
धवल उज्ज्वल आलोक-सा छा रहा है घट के अंदर
कोई सिरज रहा है मुझे फिर से      
सचमुच मैं जाग रहा हूँ धीरे-धीरे नवजीवन के विहान में

वहाँ जिनसे मुझे प्रेम मिला था
वह मुझे अपने पास बाँधकर रखना चाहते थे
पर अब अनुभव हो रहा है मुझे - 
जड़ता से बचने के लिए, निजता को बचाने के लिये
उनकी दुनिया से अपनी दुनिया मेँ वापस लौटने का मेरा निर्णय सही था |

10 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सटीक और सार्थक प्रस्तुति!

Satish Chandra Satyarthi said...

"जड़ता से बचने के लिए, निजता को बचाने के लिये
उनकी दुनिया से अपनी दुनिया मेँ वापस लौटने का मेरा निर्णय सही था|"
बेहतरीन पंक्तियाँ...

रश्मि प्रभा... said...

प्रभावित करती अभिव्यक्ति

sanjiv verma said...

जुदा होता आप से जब-
आप मन दीपक जलाता.
आप से ऊर्जा मिले तो
आप तम हर जगमगाता.
आप से जब आप मिलता
आप तब हो पूर्ण जाता.

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा..

PRAN SHARMA said...

AAPKEE LEKHNI SE EK AUR BADHIYA KAVITA .

sudhir saxena 'sudhi' said...

बहुत प्रभावी, उत्कृष्ट रचना.
बधाई.
-'सुधि'

Yamuna Pathak said...

very nice
last two lines r very impressive.

हमारीवाणी said...

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टीम हमारीवाणी

इमरान अंसारी said...

वहाँ जिनसे मुझे प्रेम मिला था
वह मुझे अपने पास बाँधकर रखना चाहते थे
पर अब अनुभव हो रहा है मुझे -
जड़ता से बचने के लिए, निजता को बचाने के लिये
उनकी दुनिया से अपनी दुनिया मेँ वापस लौटने का मेरा निर्णय सही था |

बहुत ही गहन और सटीक है ये बात ......अति सुन्दर ।

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